1 रुपए वाली मट्ठी

ये बात बड़ी पुरानी है लेकिन अक्सर आखों के आगे घूम जाती है। मैं करीब 8 या 9 साल का रहा होऊंगा जब की ये घटना है। हम जहां रहते थे, करावल नगर में, वहां ज्यादा कुछ था नहीं। टूटी हुई सड़के और आधे अधूरे घर लेकिन बहुत खुलापन था और लोगो में बहुत अपनापन। हमारे घर के ही सामने एक छोटी सी दुकान में एक दंपत्ति रहने आए थे। करीब 65 साल के व्यक्ति होंगे और 55 या 58 साल की उनकी पत्नी रही होंगी। बड़े ही सौम्य और सीधे साधे से लोग थे। दोनो के पास कुछ ज्यादा सामान नहीं था । एक संदूक रहा होगा, कुछ बर्तन 3 या 4 और 4 या 5 जोड़ी उनके कपड़े होंगे। अक्सर वो बुजुर्ग व्यक्ति एक ही कुर्ता महीनो पहने रहते थे। धीरे धीरे आस पास के लोगो से उनकी बोल चाल शुरू हो गई थी। पता चला की उनके बच्चो ने इन लोगो को घर से निकाल दिया है और उनको देखने वाला कोई नहीं है इसलिए दोनो यहां आ गए हैं। मेरे लिए ये कोई खास बात नहीं थी और ना ही वहा रहने वालो के लिए। ये एक नया मुद्दा था कुछ दिन की गप शप का कि देखो आजकल क्या जमाना आ गया है, बच्चे तो बिलकुल बर्बाद हो गए है कोई बूढ़े मां बाप के साथ ऐसा करता है क्या?

बहरहाल वो दंपत्ति धीरे धीरे वहां रहने लगे और 1 महीने बाद उन्होंने एक ठेला लगाना शुरू किया उसी छोटी सी दुकान के आगे जिसमें वो ज्यादा कुछ नहीं बस छोटी मोटी चीजे बेचते थे। जैसे बिस्कुट, मट्ठी, ब्रेड, टाफी बगेरह। मुझे कभी कभी मम्मी से 1 रुपया मिल जाता था तो मैं अक्सर कुछ खरीद लेता था। एक बार मैं उनके ठेले पर गया और उनसे 1 रुपए की मट्ठी ली। मट्टियां मैंने पहले भी बहुत ली थी लेकिन ये मट्ठी अलग थी। मैने पहली बार उन दोनो को करीब से देखा। कमाल का ताल मेल था दोनो का। उनकी पत्नी जैसे उनकी परछाई थी। वो 1 रुपए में 2 मट्ठी देते थे लेकिन उसके साथ चटनी भी देते थे, जो उनकी पत्नी बनाती थी। वो सिल बट्टे पर पीस कर चटनी बनाती थी और शायद वो उस चटनी से ही शाम को रोटी भी खा लेते थे। इतने पैसे उस ठेले से नहीं मिल पाते थे की रोज सब्जी बन जाए। धीरे धीरे मेरी उनसे जान पहचान हो गई । मैं अक्सर मम्मी से पैसे लेता और उनसे मट्ठी लेता था और मैं अपने दोस्तो के बीच उनकी मट्ठी की तारीफ करके उनको प्रोत्साहित करता था की वो भी उनकी मट्ठी खरीद ले। क्योंकि वो मट्ठी चटनी के साथ देते हैं और वो बहुत टेस्टी लगती है। खैर ये सब मेरे बहाने थे, मैं बस ये चाहता था की उनके पास ज्यादा लोग जाए ताकि उनको कुछ पैसे मिल जाया करें और उनका खाना पीना होता रहे। वो लोग ज्यादा दिन नहीं रहे वहां, एक दिन जब मैं स्कूल से आया तो उनका ठेला नही था तो मैंने मम्मी से पूछा की वो लोग कहां गए? मम्मी ने बताया की जो बुजुर्ग व्यक्ति हैं उनका देहांत हो गया है। तो मैंने पूछा और वो उनकी पत्नी? तो मम्मी ने कहा की पता नहीं वो चले गए। मैने कहा पर उनका तो कोई नहीं था, कहा गई? मम्मी को भी नहीं पता था और किसी को भी कुछ नहीं पता था। मेरे दिमाग और आंखों से उनका चेहरा नही गया कभी और वो सवाल की वो कहां गई और उनका क्या हुआ? मैं बहुत रोया था उस दिन और कई सालों तक सोचता रहा की उनका क्या हुआ? लेकिन उस एक रुपए की मट्ठी ने मुझे बहुत सिखाया। मैंने कसम ली थी उस दिन की कभी अपने मां और पिता को अकेला नहीं छोडूंगा और मैने कभी नहीं छोड़ा, आखिरी सांस तक। लेकिन आज भी 26 सालों बाद अक्सर सोचता हूं की उन बुजुर्ग महिला का क्या हुआ होगा?

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