उड़ गया पंछी अकेला
सुबह हुई वो था वहीं गहरी रात से बैठा था पहरे पर था वो किसी के सदियों रातों से बैठा था दिन को भी तो चैन नहीं था रातें भी सब लंबी थी... गहरी रातों में कई दफा गहरे खौफों से मिला था वो दिन में पत्थर खाते खाते रातों में भी घावों से घिरा था वो शांत था खामोश था ध्यान मग्न मुस्काता था वो... जैसे लंबी सजा मिली हो चुप चाप सहता जाता था वो विष्णु में स्थित रहा हमेशा मुड़ मुड़ वापस आता था वो पंख उसके घायल थे अपनी सजा बिताता था वो... एक सुबह कुछ हुआ अलग आकाश सारा नीला था कई रातों का थका हुआ वो तन और मन से गीला था दो अधर थे मुस्काते हुए नील वर्ण एक सामने था... पंछी ने देखा था हरि को जब पंछी बिल्कुल अकेला था और हरि ने कहा सब हो गया अब कट गए थे कर्म सारे जिसने हरि से दूर ढकेला था उस सुबह चुप चाप पंछी उड़ गया दूर अकेला था ।



