लोहा पीटे पिता कहीं


लोहा पीटे पिता कहीं
माँ करती सिलाई,
 
ऐसे सूखी सूखी खाकर
हमने शिक्षा पायी,
 
भ्राता मेरे बुद्धि शाली
विद्यालय में पाए बड़ाई,
 
मैं मूरख किस खेत से निकला
कोने में विष्णु पढ़ता भाई,
 
बालक मन को दिखते विष्णु
जग ने हंसी उड़ाई,
 
खेल कूद भाते न मुझको
न कहीं दोस्ती हो पायी,
 
एकाकी मैंने ऐसे ही
माँ से सीखी बुनाई,
 
अस्ति जैसा जिस्म मिला
अक्सर हुई पिटाई,
 
सब खाते थे गुल्ले बर्फी
मैंने मिट्टी खाई,
 
ऐसे ही टूटे से घर से
निकले थे दो भाई,
 
तुक्के से जैसे भोग मिला सब
देख माँ भी थी हर्षसाइ,
 
पर ज्यादा न साथ दिया
और उसने दी विदाई,
 
बालक मन अनाथ हुआ जो
बड़ी सी थी एक खाई,
 
और मृत्यु की राह देखते
विष्णु उतरे साँई ।
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