एक और चोट
मंजिल है जो उसकी कीमत में दर्द हो
तो क्या उसको छोड़ कर हम बेदर्द हो,
छोड़ दिया शरीर का मोह जिस दिन से हमने
शरीर खुद को रोज याद दिलाता है,
कभी भूख में तड़पता है
कभी चोट में चिल्लाता है,
दूर ऊपर परमात्मा पर नजर रखी है हमने
पर वो आजकल नजर न आता है,
रो ले क्या हम भी हालातों पर
लेकिन ईश्वर का प्रेम दुख में और गहराता है,
सुख आ जाए जीवन तो भूल जाऊंगा उसको
ये सोच कर ईश्वर रोज हमें नए नए दुखों को दिखाता है,
तड़पता हूं रोज, हर घड़ी चिल्लाता हूं
ईश्वर के पास अक्सर ऐसे ही हो आता हूं,
एक और चोट का धन्यवाद पूज्य परमात्मा
ऐसे ही लम्हों में तो मैं तेरे पास आता हूं ।
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