अध्यात्मोपनिषद् कि शिक्षाएं
॥ अध्यात्मोपनिषद् ॥
1. संसार का अनुकरण छोड़कर देह के अभियन को भी त्याग देना चाहिए, और अंत में आत्म अभ्यास को भी त्याग दें | इस के बाद भी जो रह जायेगा वही अध्यात्म है |
2.
सदा अपने आत्म स्वरुप में स्थित रहकर सभी प्रकार कि बातें
जो भ्रमित करती है या मन को विचलित करती है उनसे अपना ध्यान हटाते रहे |
3.
सभी रिश्तों को मन के खेल समझ कर धीरे धीरे एक दूरी बनातें
जाये, प्रयास और निरंतर अभ्यास से एक दिन मन स्थिर होकर अनमना सा हो जाता है |
उसके उपरांत जो रह जाता है वो रिश्ता फिर बंधन नही रहता अपितु इश्वारिये सेवा का
भाव से भरा हुआ होता है |
4.
जो सभी तरफ केवल ब्रह्म के अस्तित्व को देखता है, मतलब किसी
भी वास्तु या व्यक्ति के ऊपर अपना हक़ या अधिपत्य नही रखता उसकी वासना धीरे धीरे
समाप्त हो जाती है और वो जल्द ही परम शांति और स्थिरता को प्राप्त होता है |
5.
ब्रह्म निष्ठा में कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए क्यूंकि
प्रमाद ही मृत्यु है | यदि भीतर से ये आवाज़ उठी है कि अध्यात्मिक यात्रा आरम्भ हो
तो उसे कल पर न टाले |
6.
जिसे जीवित स्थिति में ही केवल्या अवस्था प्राप्त हो गयी है
वो देह होना पर भी देह्राहित के सामान है अर्थार्त ब्रह्म स्वरुप ही है | इसलिए
समथिस्थ होकर निर्विकर्ल्प बने रहो अर्थार्थ अपनी कोई इच्छा अस्तित्व पर मत लगाओ
बल्कि जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करो |
7.
अपने को ही बुद्धि और उसकी वृति का
सिर्फ साक्षी मानें और “सोऽहं “ ध्यान अभ्यास से निरंतर अपने अहम् को विसर्जित
करते जाये |
8.
वैराग्य का फल बोध है , बोध का फल विषयों से विरत होते जाना
है , और उपरति का फल आत्मानंद है | इसलिए बुद्धिमान को सदा ही अपने वैराग्य को
पकाना चाहिए |
9.
जिस प्रकार छोड़े हुए बाण निर्धारित लक्ष्य को भेदता है वैसे
ही ज्ञान उदय होने से पहले जो कर्म अज्ञान में हुए है उनके फल भी मिलेंगे ही
किन्तु अभ्यासी को कभी भी विचलित नही होना चैये और सदा ही ब्रह्म में मन स्तिर
करके धेर्य से अपने पथ पर चलते रहना चाहिए |
मैं अज़र और अमर हूँ इस प्रकार अपने आत्म स्वरुप को जो स्वीकार कर लेता है, वह आत्मरूप में ही स्थित रहता है, फिर उसे प्रारब्ध कर्म ही कल्पना ही कैसे हो सकती है |
ऊपर दी हुयी महत्पूर्ण बातों को यदि हम अपनी दैनिक आदतों में लाये तो जल्दी ही हम आत्मिस्थित होकर आत्म आनंद कि अनुभूति कर सकतें है |
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