अलौकिक वृक्ष

जीवन में हम सभी के साथ कुछ ऐसे अनुभव होते हैं जो हमारे मस्तिष्क को हैरानी से भर देते हैं । ऐसे अनुभवों को क्या कहें ये समझ से परे है, ऐसा ही एक अनुभव मैं आज लिख रहा हूँ । यद्यपि मैं कभी अपने निजी अनुभव साँझा करने वाली प्रवर्ति का व्यक्ति नहीं, मेरे ज्यादातर अनुभव गोपनीय ही रहते हैं । लेकिन कुछ किस्से मुझे अपने जीवन में हैरान कर गए हैं, कोशिश है मेरी कि उन्ही हैरानीयों को लिख सकूँ।

 

ये बात साल 2015 की है जब मैंने अपना व्यवसाय शुरू ही किया था । आर्किटेक्ट होकर प्रोजेक्ट पा पाना वो भी बिना किसी अनुभव और सहयोग के आसान नहीं था। मेरा आफिस नया था और मुझे पैसे चाहिए थे ताकि मैं अपने काम को ज्यादा से ज्यादा बड़ा सकूँ । आर्किटेक्चर को लेकर मेरा पागलपन बहुत गहरा था उस समय। तो इस लिए मैं हर छोटा या बड़ा बस काम करता जा रहा था । उस दौरान मुझे ना दिन का होश था ना रात का । 2 या 3 घंटे मैं सोता था और वाकी समय बस काम का पागलपन । तो इस दौरान मुझे एक प्रोजेक्ट मिला जो की एक बंगला था गोरखपुर में वहां के किसी मुखिया का । प्रोजेक्ट इंडियामार्ट से किसी तरह लेकर आया था लेकिन मैं दिल्ली में रहता था और प्रोजेक्ट गोरखपुर में था । लेकिन उसी दौरान मैं भागलपुर और हिमाचल में भी प्रोजेक्ट्स कर रहा था तो मैंने सोचा इसको भी करेंगे ।

खैर मेरी डिज़ाइन और प्रेजेंटेशन क्लाइंट को पसंद आये और प्रोजेक्ट मुझे मिल गया । फिर मेरा जाना हुआ गोरखपुर। वहां मेरी थोड़ी जानपहचान कांट्रेक्टर, जो की उस इमारत को बनाने वाला था से हुई। मेरा स्वभाव कुछ ऐसा रहा अपने काम में की मुझे खुद ही अपने हाथ से काम करने में मज़ा आता रहा है, तो मैं उसके टूल्स लेकर कभी दीवार बनाता था और कभी कंक्रीट । उसके बाद मैं 2 बार और गया वहां, तो वहाँ पर काम करने वाले सभी मज़दूर और मिस्त्री मेरे दोस्त हो चुके थे।

ऐसी ही एक साइट विजिट के दौरान वो ठेकेदार मुझे जबरन अपने घर पर रुकने के लिए आग्रह करने लगा । मैं होटल में ही रुकता था, लेकिन आज वो बस लेट ही गया था मेरे आगे की आज तो आप मेरे घर ही रुकोगे । सच कहु तो मैंने सोचा ठीक ही है कुछ पैसे बच ही जाएंगे होटल के । तो ऊपरी मन से ये दिखाते हुए की मैं नही जाना चाह रहा तू ही जबरन लेकर जा रहा है तो चल तेरा भी दिल रख लेता हूँ। लेकिन मुझे नहीं पता था की वहाँ मेरे साथ क्या होने वाला है ।

तो अब उसने कहा "चलो मेरे गाँव" और मैंने कहां "कहाँ है तेरा गाँव" । उसने मुझे अपनी बाइक पर बिठाया और चल पड़ा। वो गोरखपुर और नेपाल के बॉर्डर पर कहीं रहता था। करीब 40 मिनट से 1 घंटे में हम उसके गाँव पहुँचे । एक जंगल को पार करके उसका गाँव था। बहुत ही छोटा सा एक गाँव जिसमे बस 20 या 25 घर होंगे और वो भी एक तालाब के एक तरफ थे। तालाब के दूसरी तरफ खेत थे और तालाब के बीच में एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था। हम करीब 5 या 6 बजे वहां पहुँचे थे । मुझे ऐसा लगा की सब लोग बाहर ही रहते है । सड़क और गली में ही सब चारपाई डाल कर बैठे थे। उसने मुझे सबसे मिलवाया और सबने मुझे ऐसे प्यार दिया की पता नहीं मैं क्या हूँ । खैर ये सब होने के बाद उसने मुझे भोजन करवाया, जो उसकी भावना देखते हुए बोलूं तो आज तक का सबसे बेहतरीन रात्रि भोज रहा होगा मेरे लिए। उसके पास कुछ था ही नही लेकिन उसने मुझे सब कुछ दिया। तब मैं थोड़ा भावुक भी था क्योंकि मैंने कभी इस तरह से अनुभव नही किया था। वैसे लोग, वैसा गाँव । फिर करीब 10 बजे सभी सोने लगे और मैं हैरान था पूरा गाँव गालियों में की चारपाई डाल कर सो गया। मुझे भी वहीं कुएं के किनारे चारपाई पर सोने की व्यवस्था दे दी गयी । सामने ही तालाब भी था ।

अब रात भी बड़ी अजीब थी । वहां बिजली नही थी ना ही चाँद था और ना ही ज्यादा कोई तारे ही थे। बस अंधेरा ही था और मैं अपने मोबाइल की टॉर्च से ही काम चला रहा था। वहां मोबाइल के सिग्नल भी थे ही नही। खैर में सो गया लेकिन प्रकृति ने उस रात मेरे लिए अपने आँचल में जो तोहफा छुपाया था मैं  उस से अनजान था और अगली सुबह मेरी पूरी जिंदगी बदल जाएगी मैंने सोचा भी नही था।

10 बजे के बाद ही मैं सो गया और गाँव के सभी लोग सो गए थे, खतरनाक सन्नाटा था । जैसे की कान सुन्न ही हो गए हों । मैं सो चुका था ।

आधी रात करीब 2 बजे मेरी चारपाई जिसमें मच्छरदानी लगी हुई थी उसमें एक जुगनूं टिमटिमाता हुए उड़ रहा था, मेरी आंख खुल गयी,मैंने 16-20 साल बाद जुगनूं देखा था। जुगनू मुझे बचपन से बहुत प्रिय हैं क्योंकि मेरे बचपन में जुगुनो ने ही मुझे ध्यान की अवस्थाएं दी थी। मैं उठा और उस जुगनू के साथ एक और जुगनूं था । मैं खुश हुआ और मच्छर दानी से बाहर निकला तो 10-20 जुगनू और थे तालाब की तरफ और अंधेरी काली रात में अजीब सी सुनहरी रोशनी थी हर तरफ। मैं तालाब की तरफ गया और मेरे होश उड़ गए । मैंने अपनी सारी जिंदगी में जो कभी नही देखा था मेरे सामने था जिसको मैं चाह कर भी लिख कर समझा नहीं सकता ।

असंख्य जुगनूं मेरे सामने तालाब के बीचो बीच उस बड़े बरगद के पेड़ पर थे और पूरा पेड़ ऐसे चमक रहा था जैसे की कोई कल्प वृक्ष सीधे स्वर्ग से धरा पर आ गया हो। मैं रो पड़ा और वही बैठ गया। प्रकृति का ऐसा नजारा ना मैंने कहीं पढ़ा था और ना कहीं देखा। मुझे लगा मैं सपना देख रहा हूँ । मेरे चारो तरफ जुगनूं आ गए थे और मेरे सामने पूरा वृक्ष जिसके पत्तो में बस रोशनी ही टिमटिमा रही थी ।

मैं प्रकृति के आगे नतमस्तक था, मैं क्या महसूस कर रहा था ये बात लिख नही सकता लेकिन आज भी वो पेड़ वैसा का वैसा मेरी आंखों में जिंदा है। मानो जैसे स्वर्ग में कल्पवृक्ष का अनुभव रहा हो। मैं थोड़ा संभला तो सोचा कही सपना तो नही और अपने काट लिया । मैं हैरान भी था और अचम्भा था की ये संभव कैसे हो सकता है। मिट्टी की खुश्बू, ठंडी हवा, भयानक सा सन्नाटा और अकेला मैं। लेकिन प्रकृति माँ का वो सौंदर्य शब्दों में कहा ही नही जा सकता है।

मैं आज भी भावविभोर हूँ और मन्त्रमुग्ध भी की प्रकृति के ऐसे खेल से हम कितने दूर हो गए हैं। जैसे चमत्कार हमारे जीवन से हमने ही दूर कर दिए ।

मैंने उसके बाद बहुत नज़ारे देखे और बड़े सिनेमा के चलचित्र भी देखे लेकिन वो अलौकिक पेड़ जैसा अनुभव के बराबर का अनुभव कभी हुआ ही नहीं ।

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