चेतना चित्र

कभी मैं शायद थक कर कहीं तन्हाई में बैठा था और सोच रहा था की में ही ऐसे क्यों बैठा हूं । तभी कुछ हवाएं वहां धीरे से मेरे कानों में कहने लगी कि शायद मैं भी उन्ही की तरह दिशाहीन हूं। चमकीले तारों ने कहां कि शायद मैं उन्ही की तरह जिंदगी से दूर हूं। फिर सोचा मैने की शायद मैं ही गलत हूं कि तभी वहां तेज बारिश होने लगी ऐसा लगा कि आसमान रो रहा है। कुछ दूर फुटपाथ पर नंगे बच्चे निकल आए और नहाने लगे। थोड़ी दूर पर एक बूढ़ा अपने फटे चादर को ओढ़ कर बारिश से बचने की कोशिश कर रहा था, दिल्ली के फुटपाथ पर ये आम बात थी। मैं थोड़ा मुस्कुराया और फिर वहां से अपने रास्ते पर चल दिया ।

तब मुझे पता चला कि मेरे पास रास्ता भी है, मंजिल भी है और मकसद भी। वहां से चलते समय मुझे गांधी जी का वो जंतर याद आने जिसमें उन्होंने कहां था कि अगर कभी तुम्हारा अहम तुम पर हावी हो जाए तो सोचो कि जो तुम कर रहे हो उससे किसी गरीब को स्वराज मिल सकता है या नहीं और तुम्हारी सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी।

मेरा यकीन था किए आदमी पूरी दुनिया बदल सकता है, पर ये मुमकिन नहीं ये समझ आने लगा। किसी और के बारे में पता नहीं पर मैं तो सिर्फ खुद को बदल सकता हूं।

 


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