आभास
अक्सर सुनता रहा हूँ जिंदगी के विषय में, चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात । एक जीवन का किस्सा है मेरे, जिसने मुझे समझा दिया गहरे तक कितनी लंबी और गहरी है जिंदगी । मैंने कभी इस विषय में नहीं सोचा था की क्या जिंदगी और कैसी जिंदगी, मौज और मस्ती में चल रही थी जिंदगी, लेकिन एक रात मेरी सोच और समझ पूरी तरह बदल कर चली गयी।
ये
बात 2011 की किसी सर्द रात की है, मैं कॉलेज में पढ़ता था और अकेला ही रहता था होस्टल
में। घूमने का मुझे शौक नही था बल्कि पागलपन था। उन दिनों मैं एक जगह टिक नही पता था
और किसी एक इंसान से लगाव नही रख पता था। एक साथ 5-6 काम करता था। सुबह कॉलेज जाता
था, शाम को झुग्गी में बच्चो को पढ़ाता था और रात को थिएटर में अभिनय करता था उसके बाद
कविता या कोई किताब लिखता था । हर 2 दिन या 3 दिन बाद अपनी मोटरसाइकिल से लेकर अकेले
ही सड़को पर दूर निकल जाता था, बस घूमता था बिना किसी मंजिल के।
मेरी
सबसे बात थी लेकिन कोई भी मेरा गहरा मित्र नही था क्योंकि में हर 4-5 दिन बाद एक व्यक्ति
से उदासीन हो जाता था । कभी किसी महिला मित्र से प्रेम का इज़हार करता तो करते ही दूसरी
महिला पसंद आ जाती। कई बार एक साथ 8-10 महिलाएं होती जिनसे मैं आकर्षित हो जाता था
और कई बार यू भी हुआ की एक साथ कई उम्र की स्त्रियों से मैं आकर्षित रहा। मैं परेशान
था मानसिक तौर पर क्योंकि ये प्रेम नही था शुद्ध वासना थी इतना मुझे समझ आ रहा था लेकिन
मैं खुद समझ भुझ कर भी ये नही कर रहा था बल्कि स्वतः ही ये हो रहा था। इन सब विचारो
से बचने के लिए मैं बस कहीं भी निकल जाता था अपनी मोटरसाइकिल पर। घर पर ऐसी हरकतों
से बहुत सवाल उठते थे कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो वगेरह वगेरह इसलिए कभी मैं कुछ
झूठ बोल देता । कभी कहता किसी दोस्त के साथ या कभी किसी कॉलेज ट्रिप पर लेकिन मैं अक्सर
बिना मंजिल हाईवे पर अकेला मोटरसाइकिल चलाता रहता था।
ऐसे
ही एक सर्दी की शाम को मैं भोपाल में अपने होस्टल से मोटरसाइकिल लेकर दूर निकल गया
था और बस चलता जा रहा था। करीब 10 बजे तक मुझे होश नही था की जाना कहाँ है, लेकिन उसके
बाद मुझे लगा की मैं बहुत दूर आ गया हूँ और मुझे वापस जाना चाहिए। वापिसी में मुझे
12 बज गए थे और रास्ता बहुत ही उबड़ खाबड़ था (टूटा फूटा) । हाईवे पर बस धूल थी और तेज
गति से चलते ट्रक। मैं भी जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहता था अपने रूम पर क्योंकि किसी
को भी खबर नही थी कि मैं कहाँ हूँ । घर पर भी जब फ़ोन पर बात हुई तो मैंने झूठ ही कहा
था की रूम पर ही हूँ। इसलिए मैं बस जल्दी से घर वापस जाना चाहता था। मेरी गति मोटरसाइकिल
की 120 km प्रति घंटा होगी और सड़क बहुत खराब थी। धूल इतनी थी ट्रक की वजह से की कुछ
भी नही दिखाई दे रहा था, तभी मेरे सामने से 2 ट्रक एक साथ बहुत ही तेज़ गति से चलते
हुए आये । मेरी कुछ समझ में नही आया क्या करू क्योंकि मेरी मोटरसाईकल भी मेरे कंट्रोल
में नही थी और मैं दोनो ट्रक के बीच में आने वाला था, दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया
था और मुझे लगा की बस अब ये मेरा अंतिम वक़्त है। अब मैं जिंदा नही बचूंगा। ये सब 1
सेकेण्ड से भी कम समय में हो रहा था क्योंकि मेरे सामने से जो ट्रक मेरी तरफ आ रहे
थे और मैं उनकी तरफ, बेतहाशा गति में थे। मैंने बस ईश्वर को याद किया और अपनी आँखें
बन्द कर ली और मैं मरने को तैयार था। मेरी पूरी जिंदगी बस उस एक सेकेंड में मेरी आंखों
के आगे से गुज़र गयी, जितनी भी मैंने जिंदगी जी थी सब की सब एक झटके से मैंने देख ली।
मेरे दिल में मलाल था की जब मेरी लाश मेरे घरवालों को मिलेगी तो वो क्या सोचेंगे की
ये तो कह रहा था की अपने होस्टल में है। मैं ग्लानि से भी भरा हुआ था क्योंकि मैंने
झुठ कहा था, लेकिन मैं क्या कर सकता था अब?
मैंने
आँखे बन्द कर ली थी और 2 या 3 सेकेंड में ही जैसे सड़क पर सन्नाटा था, वो ट्रक गुज़र
गए थे और मैं जिंदा था। मैंने अपनी मोटरसाइकिल वही सड़क किनारे लगा दी थी और मैं सन्न
वही बैठ गया। मैं रो रहा था पागल होकर और बार बार विष्णु को धन्यवाद कर रहा था। लेकिन
वही मैं ये देख कर भी हैरान था की मेरी पूरी 23-24 साल की जिंदगी मेरी आंखों के सामने
से बस मेरी पलक गिरने और उठने भर में गुज़र गयी और मैं सोच रहा था की अगर मैं आज न मरकर
40 साल बाद भी मरा तो क्या इतनी सी ही देर में मेरी सारी जिंदगी नही गुज़र जाएगी । उस
दिन के बाद मेरे जीवन में कुछ हो गया, मैंने झुठ बोलना बन्द कर दिया। मैं उसके बाद
भी बहुत घूमा, बहुत यात्रा की अकेले पर हमेशा अपनी माँ को बताया की मैं कहाँ हूँ ताकि
मैं मर भी जाऊं तो झूठा न कहलाऊँ। मैं रोज़ ऐसे जीने लगा की रात को सोते समय मैं यही
सोचता था की अगर अगली सुबह ना उठा तो मैं आज तक की जिंदगी से संतुष्ट हूँ। मैंने जो
भी सपने सोचे थे अपने जीवन में वो सब किये भले ही कोई रिस्क ही क्यों न लेना हो ताकि
मरते हुए कुछ रह गया है ये मलाल न रहे। जिन भी लोगो को मैं अहमियत देता था सबको बताया
की मैं उनका आभारी हूँ जीवन में। मेरे जीवन से सब कुछ जो बेकार का था एकदम से खुद ही
गायब हो गया। मैं कुछ महंगा खरीदने की वजाय कुछ स्वादिष्ट भोजन करने लगा । एक प्रकार
से मेरे जीवन का पूरा खाखा बदल गया। क्योंकि जितनी मैं सोचता था उससे बहुत ही कम है
जिंदगी और समय है ही नही। बस 1 पल की है जिंदगी, अभी इसी पल में जी रहा हूँ और अभी
इसी पल में मर जाऊंगा।
मेरी
माँ के अंतिम क्षणों में, मैं अक्सर उनसे ये बातें करता था और पूछता था की जीवन कितना
रहा और वो बस कहती थी "कहाँ गया और कब गुज़रा पता ही नही चला।" मेरी माँ को मेरा ध्यान करना भाता नही था, उनको
अक्सर ये डर रहता था की मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगा। मैं अक्सर कहता था की जब तक आप हो
ये सब रोक रखा है क्योंकि बहुत भयंकर वेग है भीतर अनाहत पर मैं बहुत ज्यादा रोक नही
पाऊंगा। मैं कभी ध्यान करना नही चाहता था लेकिन कई बार माँ के ही साथ ऐसा हुआ की मैं
बैठे बैठे कहीं और होता था जिससे वो अक्सर डरती थी। मैंने अंतिम समय में उनको कई ध्यान
के अनुभव करवाये जितना भी संभव था। बस एक ऋण उतारने की कोशिश करता था, जो उतर नही सकता
था जब तक की देह है।
सोचता
हूँ आज भी जब अपने आस पास लोगो को प्रसिद्धि, धन और मान के लिए आपस में लड़ता देखता
हूँ कि पलक गिरने भर की जिंदगी है और ये क्या कर रहे हैं।
अब
और नही लिखा जाता कुछ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें