मेरा पहला ऑफिस

मेरे बचपन का सपना था कि मैं बड़ा होकर एक आर्किटेक्ट बनूँ औऱ अपना खुद का एक आफिस शुरू करूँ। किसी तरह से बस तुक्कों के चलते मैं आर्किटेक्ट तो बन गया लेकिन अपना आफिस शुरू करने की हिम्मत  जुटा पाना दूर की कौड़ी थी। मेरी नौकरी अच्छी चल रही थी, हर तरह से मुझे शांति थी लेकिन कहीं एक चीज़ थी जो शायद आखिरी कांटा था इस जीवन का- अपना खुद का काम। मैंने सभी सपने जो भी देखे थे वो पूरे हो चुके थे जैसे थिएटर में अभिनय करना, अपनी पुस्तक प्रकाशित करना, नृत्य में पुरस्कार अर्जित करना, पढ़ाई में पुरस्कार अर्जित करना, अपनी चुनिंदा जगह नौकरियां करना लेकिन मन में एक बेचैनी थी जिसकी वजह मुझे यहीं लगती थी कि मैं अपना काम नही बल्कि नौकरी कर रहा हूँ। लेकिन अपने काम की शुरुआत आसान नही थी क्योंकि न तो मेरे पास कोई धनराशि थी और न ही मेरे माता पिता के पास कोई जमापूँजी। सबसे बड़ी समस्या थी कि आफिस खुल भी गया तो मैं प्रोजेक्ट कैसे लाऊंगा क्योंकि जिस समाज से मैं ताल्लुक रखता था वहां कहीं से भी कोई आर्किटेक्ट को पैसे देकर काम नही करवाता था। यही सोच कर मैं टालता रहता था इस विचार को लेकिन क्योंकि मैं बस इस संकल्प के साथ जीवन जी रहा था कि मरते समय मुझे अफसोस नही करना कि ये चीज़ करने से छूट गयी और पता नही मौत कब आ जाये इसलिए आखिर में मैंने हिम्मत करके अपने ही एक सहकर्मी के साथ आफिस की शुरुआत की लेकिन मेरी पार्टनरशिप वहां ज्यादा नही चली और मैं फिर वहीं खड़ा था जहां पहले था। फिर डर कर मैंने नौकरी की लेकिन फिर वही ख़याल परेशान करता रहा तो अंततः मैंने हिम्मत करके अपने भाई से 25000 रुपए उधार लिए और प्रिंटर खरीद कर आफिस खोल कर बैठ गया। 4000 रुपए में मैंने justdial पर अपनी कंपनी रजिस्टर की और बस बैठ गया। बैठ तो मैं गया था लेकिन कोई काम नही था मेरे पास और ना ही मुझे कोई तजुर्बा था तो बस मेरी जमा पूंजी दिन पर दिन कम होती जा रही थी।

इन सब के बीच मुझे छोटा मोटा काम मिलता था कभी 3000 का कभी 5000 का लेक़िन करीब 6 महीने बैठने के बाद भी मेरे हाथ में कोई बड़ा प्रोजेक्ट नही था। मेरे आस पास सभी मुझे कहते रहते थे कि क्यों समय खराब कर रहे हो, तुम नौकरी कर लो क्योंकि तुम्हारा कोई लिंक या गॉडफादर है ही नही प्रोजेक्ट कहाँ से लाओगे। मैं भी यही सोचता था लेकिन बस अंदर कुछ था जो मुझे वापस हिम्मत दे देता था।

करीब 8 महीने गुज़रने के बाद एक दिन मुझे एक फ़ोन आया कि हम आपसे मिलना चाहते हैं किसी काम के सिलसिले में। मैं बेमन से लक्ष्मी नगर उनके आफिस मीटिंग के लिए गया। वहां एक आफिस प्रोजेक्ट था जिसके लिए मुझे बुलाया गया था, मैंने वहां की जानकारी ली और वापस आ गया। दूसरे ही दिन मैंने अपना प्रेजेंटेशन उन लोगो को भेज दिया जो उन्हें पसंद आ गया और वापस उनलोगों ने मुझे मिलने बुलाया। फिर मीटिंगके दौरान उन्होंने कहाँ की क्या तुम ही ये प्रोजेक्ट कर दोगे तो मैंने हाँ कह दिया। तो वो बोले जी हमें एस्टीमेट बताओ अभी हम देखते हैं। मैंने आनन फानन में। 12 लाख के एक एस्टीमेट उन्हें बता दिया और 50% एडवांस पर काम करूंगा ये बोल दिया। दूसरे ही पल उन लोगो ने मुझे 6 लाख का एक चेक दे दिया और कहा कल से कम शुरू करो। मैं खुशी से पागल हो गया क्योंकि आखिर में मुझे पहला काम मिल चुका था लेकिन मेरी खुशी कुछ घंटो की ही थी।

काम शुरू करने के लिए जब मैंने लोगो को बुलाना शुरू किया तो पता चला कि मैं मूर्ख बन चुका हूँ  क्योंकि मुझे कुछ अंदाज़ा ही नही था । मैं 20- 25 लाख का प्रोजेक्ट 12 लाख में ले चुका था और एग्रीमेंट भी sign कर चुका था।

मेरा दिमाग हिल चुका था और मैंने अपनी माँ को ये बात बताई तो वो भी डर गई। उन्होंने कहाँ तू ये सब काम छोड़ और नौकरी पकड़ ले। तू कल ही उन लोगो को एडवांस वापस दे कर माफी मांग ले। मैंने भी यही सोचा कि मेरे बस का नही है ये सब मुझे छोड़ देना चाहिए और मैं वही सो गया सोफे पर। उस दिन पहली बार मुझे lucid ड्रीम का अनुभव हुआ जैसे मैं खुद से बाहर ही हूँ। मैंने बहुत ध्यान से अपने शरीर को बाहर से देखा और सब कुछ देखा और उसके बाद मैं जाग गया। मुझे लगा अब मैं पागल हो चुका हूँ मुझे किसी मानसिक चिकित्सक की जरूरत है। फिर न जाने क्यों मैंने सोचा कि आज अगर मैं ये काम नहींकरता तो सारी जिंदगी मैं कभी अपना काम नही कर पाऊंगा, और शायद खुद ही अपने अंदर तड़पता हुआ मर जाऊंगा। तो मैंने सोचा कि अब जो भी हो ये काम मैं करूँगा और अगर कर न पाया तो आत्महत्या कर लूंगा, वैसे भी मेरे जीने मरने की मेरी माँ के अलावा किसे पड़ी है।

खैर मैं अगले दिन से काम में लग गया और दिन रात एक कर दिए। लगभग आधा काम मैंने खुद किया। जिन लोगो के साथ मैंने अपना पहला प्रोजेक्ट किया था मिस्त्री, और कांट्रेक्टर आपको हैरानी होगी पिछले 5 साल से वही मेरे साथ आज भी काम कर रहे है। मैंने अपनी अकल के सारे घोड़े खोल दिये थे, रातों को नींद गायब थी  तनाव के कारण इसलिए मैं रिसर्च ही करता रहता था कि कैसे कम पैसे में काम हो। बस दिन रात भगवान का नाम लेकर में जी रहा था। मेरे lucid और vivid ड्रीम बढ़ते ही जा रहे थे। मुझे असल जिंदगी का और स्वप्न अवस्था का बोध खत्म हो चुका था। जो मैं सोते हुए करता था वो मुझे सच लगता था और जो जागते हुए वो सपना। लगभग हर दूसरे दिन मैं अपने शरीर के बाहर से खुद को देख रहा होता था और सोते सोते भी जैसे मेरी सांसे विष्णु विष्णु करती रहती थी । मैं डर और तनाव से घिरा अपना प्रोजेक्ट कर रहा था कि जैसे मुझे एक चमत्कार से सब कुछ ठीक होते दिखने लगा। मैंने अपने रिसर्च और काम में पाया की हमारे काम में पैसा कैसे बचना है।

बहरहाल मैंने 1.5 महीने में वो प्रोजेक्ट किया जो 25 लाख का था और मैंने 12 लाख में किया जिसमें से मैंने भी कुछ पैसे बचाये अपने लिए। अपने साथ काम करने वालो को पैसे दिए तो वो भी हैरान थे, बोलते थे कि आपकी हालात देख कर हमें पसीने आ रहे है 1 महीने से, ये कैसे काम करते हो आप। एक लड़का था मेरे साथ जिसे कोई काम नही देता था, मैंने उस पर भरोसा करके उसे काम दिया था क्योंकि मेरे पास कोई चारा नही था । जब वो ईद पर मेरे लिए सिवईयां लाया तो बोला कि sir आज मैंने नई शर्ट खरीदीं है और माँ को भी नए कपड़े लिए है। मुझे कोई काम नही देता था लेकिन आपने भरोसा किया।

मैं हैरान सा था कि ये सब कुछ कैसे हुआ और मैंने भी अपनी माँ के हाथ में अपने पहले प्रोजेक्ट की कमाई रखी । अपने सारे उधार चुका दिए और उस रात एक अरसे बाद में निश्चिन्त सोया था। सुकून की परिभाषा बहुत सुनी थी मैंने लेकिन वो रात मैंने जाना था सुकून होता क्या है।

उस दिन से आज तक 5 साल पता नही कहाँ गुज़र गए और अब प्रोजेक्ट करना जैसे खेल जैसा हो गया है लेकिन वो 1 महीना मेरी शख्शियत को हिला गया था और मुश्किल हालात में दिमाग को ठंडा रखने सीखा गया था।

बस यही कहूंगा आखिर में कि अपने सपने पूरे करो सारे जीवन में, बहुत सुकून से जीवन के पार हो जाओगे। और जीवन के पार का जब पाओगे तो नाच उठोगे आनंद से।

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