माँ प्रकृति

जब मैं वहां अकेला खड़ा था तो मैंने देखा, सामने वाले ऊंचे पहाड़ से जो झरना गिर रहा था वो नीचे नदी में मिलकर कुछ मीठी सी आवाज बना रहा था। तभी वहां से कुछ बड़े पक्षी गुजरे जो शायद घर का रास्ता भूल गए थे और उस कोयल को में कैसे भूल सकता हूं जो मेरे पीछे वाले पेड़ पर थी। मैं नीले आकाश को देख रहा था और उन बातों को सोच रहा था जो हमेशा मेरे साथ रहती थीं। नीचे वाले सीधे मैदान पर कुछ हिरण घास खा रहे थे, तभी मेरा ध्यान एक चींटी पर गया जो बड़ी ही मेहनत से पता नहीं शायद कोई गेंहू का बड़ा सा दाना लेकर पेड़ पर चढ़ रही थी और उसके पीछे एक लंबी पंक्ति में चींटियां चढ़ रही थी। उस पहाड़ के नीचे से होकर जो टेढ़ी मेढ़ी गली थी, उसके आखिरी छोर पर एक जो पेड़ था,वहां कुछ कुछ बंदर एक दूसरे की कभी शायद पीठ देख रहे थे तो कभी सर। उसी पेड़ के ऊपर कुछ छोटी चिड़िया अपने ही खेल खेल रहीं थी। कभी वो गोल घूमकर वापस बैठ जाती थीं, तो कभी नदी से पानी लेकर अपने सिर नदी में डूबा देती थी। ऊपर आसमान में जो सूरज अब छुपने ही वाला था दूर दूर तक सुनहरी सी रोशनी फैला रहा था और उसके सामने ही हल्का हल्का प्रकाश लेकर चंद्रमा नजर आ रहा था। नदी के दूसरे किनारे पर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें से धुआं उठ रहा था। कुछ लोग खाना बना रहे थे शायद। मेरे इस सपने में मेरे पास जो चीज़ें हैं सभी थी, फिर भी पता नही पूरे सपने में मेरी नजर किसको ढूंढ रही थी। कुछ हल्का संगीत भी महसूस किया मैंने और फिर भी मैं किसी को ढूंढता फिर रहा था कि अचानक पीछे से आवाज आई। एक जानी पहचानी आवाज थी और मैने पलट कर देखा तो…

मम्मी के रही थी, "उठो और तैयार हो जाओ।"

मैने देखा की सूरज चढ़ आया है और पूरे दिनभर के कामों के लिए मुझे तैयार होना है।

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