अध्यात्म उपनिषद
शांतिपाठ :
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते॥
शरीरस्थ गुहा में एक अजन्म ‘नित्य’ रहता है । इसका शरीर
पृथ्वी है । पृथ्वी के भीतर रहते हुए भी पृथ्वी इसे नहीं जानती। इसी प्रकार जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, अव्यक्त, अक्षर और मृत्यु इसके शरीर हैं, यह इन सबके अंत: में रहता है, किंतु यह सब इसे नहीं जानते हैं । वह सब भूतों (प्राणियों)
का अंतरात्मा है, वह नष्ट पाप एक दिव्य देह नारायण
है । देह तथा नेत्र आदि इंद्रियां सब आत्मक पदार्थ हैं । इन सबमें ‘मैं और मेरा’
ऐसी भावना केवल भ्रम है। विद्वान जन ब्रह्मनिष्ठा से इस भ्रम को दूर करें (1)।
स्वयं को बुद्धि तथा उसकी वृत्तियों को साक्षी समझकर ‘मैं
वही हूं’ इस वृत्ति से अपने अतिरिक्त सब पदार्थों के प्रति अपना भाव (आत्मबद्धि)
त्याग दें। क्रमश: लोक देह और शास्त्र का अनुसरण छोड़कर अंत में आत्मा का अभ्यास
भी छोड़ दे । युक्ति, श्रुति एवं स्वानुभूति से सभी को
आत्मा में जानकर स्थित योगी का मन नष्ट होता है । निद्रा, लोकवार्ता, शब्द आदि से अपने को भूलना, इन्हें अवसर न देकर स्वयं आत्मा का चिंतन करो । (2-5)
यह देह मां-बाप के
मल से उत्पन्न तथा मल-मांस से भरा हुआ है, अत: इसको चांडाल के समान त्यागकर ब्रह्म बनकर कृतार्थ होओ।
परमात्मा रूप महाकाश में आत्मारूप घड़े को एक रूप करके, हे मुनि सदा मौन रहो। स्वयं प्रकाशित स्वयंजन्मा परम ब्रह्म
बनकर देह, अंडकोश तथा ब्रह्मांडका भी मलपात्र
के समान त्याग कर दो। देह, में आरूढ़ अहंकार को सदा आनंद रूप
चिदात्मा में लगाकर शरीर को त्यागकर ‘केवल’ भाव बनो । दर्पण में दिखनेवाले शहर के
समान जिसमें यह जगत दिखाई देता है, ‘मैं वही ब्रह्म हूं’, ऐसा जानकर कृतार्थ बनो । (6-10)
अहंकार रूपी ग्रह से छूटा व्यक्ति अपने रूप को प्राप्त करके
पूर्णंद्र के समान निर्मल होकर सदा आनंद एवं स्वयंप्रभ बनता है । क्रिया, चिंता एवं वासना का एक के बाद एक क्रम से नाश होता है। यही
मोक्ष एवं जीवन मुक्ति कहलाती है । सर्वत्र सब में ब्रह्म को देखना-इस भावना के
दृढ़ होने पर वासना नष्ट हो जाती है। ब्रह्मवादियों का कथन है कि विद्या में तथा
ब्रह्मनिष्ठा में प्रमाद कदापि नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही मृत्यु है । जैसे थोड़ा शैवाल हटा देने पर भी
वह पानी को ढंक लेता है, इसी प्रकार ब्रह्मविमुख प्राज्ञ को
भी माया पुन: ढंक लेती है । (11-15)
जिसे जीते जी ‘केवल’ ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त हो गई, वह देहांत पर भी ब्रह्मरूप बनेगा, अतः हे निर्दोष ! निर्विकल्प समाधिवाले बनो । निर्विकल्प
समाधि में अद्वैत आत्मा के दर्शन होने पर अज्ञान ग्रंथि नष्ट हो जाती है । आत्म तत्त्व
को दृढ़ करते हुए, ‘मैं’ ‘मेरा’ इन भावों को त्यागते
हुए घड़े वस्त्र आदि के समान उदासीन रहें । ब्रह्मा से कीड़े तक सारी उपाधियां
मिथ्या हैं । अतः एकात्मा स्थित होकर सर्वत्र अपनी आत्मा का दर्शन करना चाहिए ।
ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, शिव तथा यह समस्त जगत वह ‘स्वयं’
है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं । (16-20)
स्वयं की आत्मा में समस्त वस्तुओं का आभास केवल आरोपित है, अत: इसे दूर करके ही पूर्ण अद्वैत परमब्रह्म बना जा सकता
है। एक ही आत्मारूप वस्तु में प्रतीयमान विकल्प भेद मिथ्या है, क्योंकि निराकार,
निर्विका (परमात्मा) दर्शन, दर्शद आदि गुणों से शून्य है । वह निर्दोष तथा प्रलय कालीन
समुद्र सदृश पूर्ण है । परम तत्त्व के दर्शनों पर भ्रांति, प्रकाश में अंधकार के समान लुप्त हो जाती है। अद्वितीय परम
तत्त्व में भेद कैसे हो सकते हैं । वह एक स्वसूप तथा सुखरूप ही है । (21-25)
इस वैकल्य का मूल चित्त है, चित्त के अभाव में विकल्य नहीं रहता । अत:प्रत्यग रूप
परमात्मा में चित्त को लगाओ। अखंड आनंदमय आत्मा को अपना ही स्वरूप समझते हुए इस
आत्मा के अंदर बाहर आनंद-रस का आस्वाद ले। वैराग्य का फल ज्ञान, ज्ञान का उपरति,
उपरति का आत्मानंद के अनुभव की
शांति है। उनकी उत्तरोत्तर प्राप्ति न होने पर पूर्व फल व्यर्थ है । विषय निवृत्ति
परम तृप्ति है । आत्मा का आ नंद स्वयं में अनुपम है । जगत का कारण माया, उपाधिवाला सर्वज्ञाता आदि मुक्त है । परोक्षता सत्य आदि
स्वरूप आत्मा ही सत् है । (26-30)
‘मैं’ इस शब्द का अनुभव तथा शब्द का आश्रय प्रतीत होनेवाला, जिसका ज्ञान अंत:करण से अलग है, ऐसा जीव ‘तुम’ कहा जाता है । माया एवं जीव इन दो उपाधियों
के परित्याग पर केवल परम ब्रह्म ही दिखाई पड़ता है । इस प्रकार वह तू ही है, इस प्रकार के महावाक्यों से जीव एवं ब्रह्म की एकता को
विचार कर अनुसंधान श्रवण है, श्रवण पर विचार करना मनन है । इन
दोनों से निकले निष्कर्ष में चित्त को लगाना निदिध्यासन है। फिर ध्याता-ध्येय में
अभेद करके चित्त को केवल ध्येय में लगाकर वायु हीन स्थान पर रखे दीपक के समान
निश्चल बन जाना ही समाधि है । (31-35)
इस समाधि में वृत्तियां अज्ञात तथा आत्मागोचर होती हैं।
समाधि के बाद उठने पर उत्पन्न वृत्तियों का अनुमान किया जाता है । इस अनादि संसार
में करोड़ कर्मों का संचय होता है, समाधि से इनका विलय होकर शुद्ध
धर्म बढ़ता है। समाधि योग को जाननेवाले इसे धर्म मेघ कहते हैं। इसमें हजारों
धाराओं में धर्मामृत बहता है । इससे वासना का जाल समूल नष्ट होता है, पाप-पुण्य भी नहीं रहते । तब प्रथम महावाक्य ‘तुम वही हो’
(तत्त्वमरसि) का परोक्ष आभास होता है,
फिर हाथ में रखे आंवले के समान
अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है (36-40)।
भोग्य पदार्थों के प्रति वासना का न होना वैराग्य का तथा
‘अहं’ का उदय न होना ज्ञान का लक्ष्य है। लीन हुई वृत्तियों का पुनः उदय न होना
उपरति है। इस प्रकार स्थितप्रज्ञ यति सदा आनंदित रहता है। ब्रह्म में लीन मनवाला
निर्विकार एवं निष्क्रिय रहता है। शोधित ब्रह्म एवं आत्मा-एकत्ववाली निर्विकल्प
वृत्ति प्रज्ञा है। इससे युक्त साधक जीवन मुक्त कहा जाता है । देह, इंद्रियों अथवा अन्य पदार्थों के प्रति निर्ममत्व भी
जीवनमुक्तता है । (41-45)
जीव-ब्रह्म में,
ब्रह्म-सृष्टि में जिसकी बुद्धि
अभेद समझती है, वह तथा सज्जनों द्वारा सम्मानित और
दुष्टों द्वारा दुःखी किए जाने पर जो दोनों को समान समझनेवाला जीवन मुक्त है ।
ब्रह्म तत्त्व को जानने पर संसार पूर्ववत् नहीं प्रतीत होता । यदि यह पूर्ववत
प्रतीत हो, तो वह अभी तक ब्रह्म को नहीं जानता, वह केवल बहिर्मुखी है । प्रारब्ध कर्म तक सुखादिका अनुभव
होता है; यही मान्यता है, क्योंकि क्रिया होने पर ही फल का उदय होता है, इसके बिना कदापि नहीं, मैं ब्रह्म हूं (अहं ब्रह्मास्मि), के ज्ञान से अरबों कल्पों के जन्म से अर्जित कर्मों का वैसे
ही नाश हो जाता है, जैसे उठने पर स्वप्न का ।(46-50)
स्वयं की आकाश के समान असंग और उदासीन समझकर योगी कर्म में
बिलकुल लिप्त नहीं होता। जैसे मदिरा के घड़े के ऊपर का आकाश उसकी गंध से युक्त
नहीं होता, वैसे ही आत्मा उपाधि के गुणों से
लिप्त नहीं होता। जैसे लक्ष्य पर छोड़ा गया तीर उसे बिना बेधे नहीं छोड़ता, वैसे ही ज्ञान-प्राप्ति से पूर्व किया कर्म बाद में फल देता
ही है । व्याघ्र के उद्देश्य से छोड़ा गया तीर जैसे यह व्याघ्र नहीं गाय है ऐसा
जानकार भी उसे नहीं छोड़ता, ऐसे ही कृतकर्म ज्ञान-प्राप्ति के
बाद भी फल देता ही है । मैं अजर-अमर हूं जिसे यह ज्ञान हो जाता है, उसे प्रारब्ध कर्मों की कल्पना कैसे होगी? (51-55)
देह के ऊपर आत्मबुद्धि होने पर ही प्रारब्ध कर्म सिद्ध होता
है । देह के प्रति आत्मभाव रखना इष्ट नहीं है, अत: इसे त्यागकर प्रारब्ध का त्याग करें। देह भ्रांति
प्राणी के प्रारब्ध के कारण है । अतः यह कल्पित है; सत्य नहीं। असत्य का जन्म कैसे? अजन्म का नाम कहां से आया? अत: जो है नहीं उसे प्रारब्ध कैसे? देह अज्ञान का कर्म है। यदि ज्ञान से अज्ञान समूल नष्ट हो
जाए, तो देह कैसे? ऐसी शंका का समाधान यह है कि वेदों ने प्रारब्ध को बाह्य
दृष्टि से कहा है, न कि विद्वानों के उद्देश्य से देह
सत्य है’ यह जानने के लिए। (56-60)
वस्तुतः ब्रह्म परिपूर्ण, अनादि, अनंत, अप्रमेय, अविकारी, सत, धन, चिन्मय नित्य,
आनंदधन अव्यय, प्रत्येक में व्यापक, सर्वतोमुख, त्याग एवं ग्रहण में असमर्थ, निराधार, निराश्रय, निष्क्रिय, सूक्ष्म, निर्विकल्प स्वयं सिद्धि, शुद्ध, बुद्ध स्वयं जैसा, मन-वाणी से अगम्य,
एक अद्वैत है । उसके अतिरिक्त कोई
भी नहीं है । इस प्रकार स्वयं के अनुभव से अपनी आत्मा को अखंडित मानकर निर्विकल्पक
आत्मा में सुख से स्थित । (यह सुनकर ज्ञान प्राप्त शिष्य बोला- मेरे द्वारा अभी
देखा गया जगत कहां गया? किसने ले लिया? कहां लीन हो गया?
क्या यह महान् आश्चर्य नहीं है ? (61-66)
अखंड आनंदरूपी ब्रह्म सागर में अब क्या छोड़ना या क्या लेना
है? न कुछ देखता हूं, न सुनता हूं और न जानता हूं । मैं आत्मस्वरूप सदा आनंदरूप
अपना लक्षण स्वयं हूं । मैं असंग हूं,
अनंग (देहरहित) हूं, चिह्नहीन हूं,
श्री हरि हूं, प्रशांत हूं, अनंत हूं, परिपूर्ण हूं और प्राचीनतम हूं । मैं अकर्ता, अभोक्ता, अविकारी, अनश्वर, शुद्ध बोधस्वरूप, केवल और शिव हूं(67-70)।
यह
विद्या गुरु ने अपांतरतम को, इसने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने घोरांगिरस को घोरांगिरस ने रैक्य को, रैक्य ने राम को तथा राम ने सभी को दी। यह निर्वाण का उपदेश
वेद की आज्ञा है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें