असलियत
फिर से मैने कहा,"चल आगे बढ़।"
तो
वो अजीब तरह से मुझे देख रहा था । मैं भी मन ही मन उसे कोस रहा था, सारा का सारा मूड
खराब कर दिया। अरे! भीख मांगनी है तो मांगो पर कम से कम हाथ धो के पीछे तो मत पड़ो।
वो
जा रहा था और मैं उसी को देख रहा था और सोच रहा था की क्यों एक हट्टा कट्टा नौजवान
लड़का भीख मांग रहा है । पर उसकी आंखें, उसकी वो आंखें मैं नहीं भूल पाया। बस स्टैंड
पर बहुत भीड़ थी, तो मैंने सोचा अगले स्टैंड से बस पकड़ता हूं और पैदल चल दिया। पर
रास्ते में मैं सोच रहा था, "कुछ पैसे तो पड़े ही थे फालतू, दे देना चाहिए था
और लोग भी तो दे रहे थे। मैं सच में इतना कठोर तो नहीं हूं, तो क्या हो जाता कुछ पैसों
में?"
पता
ही नहीं चला कब बस स्टैंड आ गया और मैं चुपचाप सर झुका कर खड़ा हो गया। कुछ देर में
बस भी आ गई और मैं उस में चढ़ भी गया। बस मैं बहुत भीड़ थी इसलिए खिड़की के पास जाकर
मैं खड़ा हो गया। पता नहीं क्यों दिल अंदर से टूट रहा था कि सामने वाली स्टॉल पर मैंने
देखा वही भिखारी अपने कुछ और दोस्तों के साथ सिगरेट और ड्रिंक पी रहा है।
और
बस चल पड़ी।
मैं
उसी तरफ पलट कर देखता रहा जब तक वो अदृश्य नहीं हो गया। मैं समझ नहीं पा रहा था मैने सही किया या गलत?
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