हरि आप बोले क्यों न?

 कुछ उद्घोषणा अच्छी नही होती, यकायक बोल दी जाएं तो बदतमीज़ी सी लगती है यही सोच कर हरिदास 5 सालों से चुपचाप चक्की चलाता और आटा पीसता रहता था। उसके चारों ही तरफ ज्ञानी और जाग्रत बुद्धो की जमात थी जिस समाज मैं वो रहता था। वो जात का छोटा आदमी था, कह देता खड़ा होकर मैं ही हूँ ब्रह्म, तो शायद बदतमीज़ी हो जाती। क्योंकि आत्मा, चरित्र, पुनः जन्म और अस्तित्व इनपर असंख्य लेख और महात्माओं की रोज की ही बैठकों में बड़े गहरे वाद विवाद होते थे। महापुरुष दूसरे लोगो के जीवन सुधार में रोज ही लगे हुए थे और घड़ी घड़ी घोषणा कर देते थे कि हमने संसार और अपनी वासना त्याग दी है केवल जन कल्याण हेतु और फिर खा पी कर मस्त होकर सोते थे। हरि को कभी समझ नही आया कि क्यों लोग अपना व्यवसाय जो कर रहे है उस संसार से जो भी धन अर्जित करते हैं वो इन महात्माओं को दान में देते हैं और फिर वो महात्मा उनका दान लेकर उन्हें बताते है कि तुम सब कितने दीन हो, कितने पापी और जो काम तुम कर रहे हो वो तो बिल्कुल ही घटिया काम है, हमें देखो और कुछ सार्थक काम करो। हरि सोचता था कि अगर समाज अचानक ही ये काम जो घटिया और पाप के है छोड़ दे तो महात्माओं का मोटा दान उनको कैसे मिलेगा।

 

हरिदास सरल व्यक्ति था, उसके कुछ अज्ञात के अनुभव वो कभी कभी कह भी देना चाहता था, लेकिन चुप ही रह जाता था। लेकिन हरिदास कुछ कहे न कहे उसकी उपस्थिति ही कुछ और थी ये बात हरिदास की पत्नी प्रेमलता समझने लगी थी। कुछ वर्षों से प्रेमलता हरिदास की ओर अनायास ही अजीब आकर्षण महसूस करती थी जो कोई वैवाहिक या शारीरिक आकर्षण नही था। हरि में एक ठहराव था जैसा कुछ बड़ा पता हो उसको। प्रेम हरि से पूछती थी लेकिन हरि टाल जाता था। हरि कहता था मैं क्या जानू सब विष्णु जाने। हरिदास यूँ ही जिया, वो जहां रहा वहां पावनता आ गयी। हरि ने सारे जीवन में कोई उद्घोषणा नही ही लेकिन उसके होने भर से लोग सहज समाधिस्थ हो जाते। जीवन भर हरि अपनी चक्की पर आटा पीसता रहा। आते जाते उसके जानकार उससे पूछते थे उसके अजीब विषमय पूर्ण चरित्र के विषय में, " हरि बात क्या है तुम जैसे जैसे प्रौढ़ हो रहे हो वैसे ही और आकर्षित लगते हो। बड़ी शांति मिलती हैं तुमसे बात करके, ये मामला क्या है?"

 

और हरी कहते,"मैं क्या जानू सब विष्णु जाने।"

 

हरि की मृत्यु हुई उन्होंने मोक्ष न मांगा, न वैकुंठ मांगा और न मुक्ति। हरि हरि में लीन हुए और धारणा करके वायु हो गए। हरि हो गए वायु और फैल गए आकाश में। हरी हरिमय हो गए, कभी मिले तो पुछना है मुझे कि हरि आप बोले क्यों न?

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